Hindi poetry, Poetry

मिलन 2020

फिर मिले हैं हम
बुढापे की कगार पर खड़े,
अपने आप को ठरकी कहने वाले।
कुछ दोस्त मिले हैं फिर आज।

आँखों की रोशनी शायद धुंधलाने लगी हो,
मोटापे की मार से शायद परेशान भी हो।
बालों मे भले सुनहरे परत चढे हो।
लेकिन दिल से जवां है सारे।

बचपन इनके रगों में दौड़ता है।
सुकून, बचपन की यादों में खोजता है।
आज, फिर से वे सारे मिले है।

कह दो तारों को
आज रात उन्हें जागना होगा।
चन्दा को
अपनी चांदनी लिये ठहरना होगा।
हवाओं को आज
मतवाले सुर लिए बहना होगा।
क्योंकि
दोस्ती की यह बेमिसाल जश्न जो आज होगा।

बचपन से आज बचपन की मुलाकात जो होगी।
किस्सों की लड़ी से दिवाली जैसी रोशनी जो होगी।
उम्र के बढते कदम पर ठहाकों की बेड़ियाँ डाले जाएंगे।
कल कि फिक्र को जाम मे डुबोया जाएगा।
क्योंकि आज फिर मिले है दोस्त सारे।
आज फिर, मिले हैं दोस्त सारे।

मेरे बचपन के सभी स्कूल के दोस्तों को समर्पित

Copyright reserved @ Goutam Dutta

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खो गए ख्वाब

कुछ सपने हमने भी देखें थे।
लेकिन किसी बेरहम ने झकझोर कर जगा दिया
और वे ख्व़ाब जिन्दगी की चकाचौंध रौशनी मे
दफन हो गए।

Copyright @Goutam Dutta

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तुम्हारा पचास

दुनिया को बताओ
आज तुम्हारा पचास।
भर लो दिल में खुशियों का अहसास
आज तुम्हारा पचास।
खेलने दो हवाओं को अपने बालों से बेहिसाब,
झटक के कंधों को, छंदों को बुलाओ अपने पास,
सुनहरे बालों पे सूरज कि झिलिक को न छुपाओ आज,
तुम्हारा आज पचास।

बे-तुक की बातों को दिल से get-out कर दो।
पचास वाला दिल को आज मतवाला कर लो।
दुनिया की चहल-पहल से तनिक अलग हट लो।
दिमाग को झकझोर कर पचास सालों की कुछ सुनहरी यादें चुन लो।
हो आषाढ़, या फिर सावन, या बैशाख,
हर मौसम के सूरज से रु-ब-रू होने का,
रखो अ-मिट विश्वास।

Amul chocolate की मिठास भर कर फिर हो जाए
तुम्हारा पचास।
Dutta केन्टीन के पत्ते के दोने में भरा सिंघाड़े के साथ फिर हो जाए
तुम्हारा पचास।
हमारे उस छोटे से कसबे के दिनों के साथ फिर हो जाए,
खतो में बन्द वो सारे अन्दाज लिए फिर हो जाए,
Kawasaki बाईक पे बैठ जमशेदपुर के रास्तों पर चलते हुए, फिर हो जाए,
तुम्हारा पचास।

Grow old with me, the best is yet to be-
इन पंक्तियों के सफर की शुरुआत हो जाए आज।
पचासि की ओर बढ़ चले बे-फिक्र,
तुम्हारा पचास।

१९ अक्टूबर २०१९

पत्नी की पचासवीं वर्षगांठ पर

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मेरा शहर बढ़ रहा

बहुत ही है प्यासा।
बढ़ता ही जा रहा
हर तरफ बाहें फैलाता
गला घोंटने को है उतावला,
यह शहर मेरा।

कांक्रीट की यह इमारतें
निकल पड़े हैं हर गलि,
हर मुहल्ले, हर रास्ते,
हरियाली पर कर प्रहार,
न जाने किस मुकाम की है तालाश।

खामोश बैठा सिसकियां भरता।
दो गज़ जमीन का वह टुकड़ा।
पेड़ों कि सजीवता बरकरार रखने कि चेष्टा
पत्थर की दीवारों पर विफल सर कूटता।

भूल गए हैं रास्ते परिंदे,
अट्टालिकाएं जो उनके पथ पर पाते खड़े।
हर शाम को मेरा बालकनी को मैं निराश पाता।
दूर श्रितिज पर
सूरज की रंगों की बौछार का दृश्य से वंचित रहता।

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