বেলা শেষ

মৃত্যু তুমি আসবে কেমনে কোন দেশ এ, কোন রূপে? আসবে কি ঝড়ের বেগে, ঘূর্ণির পাঁকে, পেঁচিয়ে নিতে? কিম্বা আসবে বীর সৈনিকের বেশে, তোমার জয়ের ঘোষণা, যুদ্ধ শেষে? আসবে কি তুমি নিঝুম রাতে, মন ভোলানো এক স্বপনের সাথে? কিম্বা একদিন চলার পথে, নিয়ে জাবে খেলার ছলে, হাতটা ধরে? মৃত্যু তুমি নীরব কেন? প্রশ্ন গুলোর উত্তর কি … Continue reading বেলা শেষ

Commitment

#1 The shower had stopped and the raindrops hung from wires and leaves Swinging gently in the breeze, unsure of the new surroundings, loath to making new commitments to the world below. #2 Spring came with it’s commitment to spread warmth and cheer. It impregnated the air with love, awoke the cuckoo and reached the … Continue reading Commitment

Soaring imagination

The wind howled and banged against closed doors and windows. Freed of the confines of silence That hangs like a heavy shroud over the sea, It longed for the company of the humans, Of life that lived and throbbed with its own intensity Within glass and concrete. Alas, the humans only saw threat and fear … Continue reading Soaring imagination

तुम्हारा पचास

दुनिया को बताओ आज तुम्हारा पचास। भर लो दिल में खुशियों का अहसास आज तुम्हारा पचास। खेलने दो हवाओं को अपने बालों से बेहिसाब, झटक के कंधों को, छंदों को बुलाओ अपने पास, सुनहरे बालों पे सूरज कि झिलिक को न छुपाओ आज, तुम्हारा आज पचास। बे-तुक की बातों को दिल से get-out कर दो। … Continue reading तुम्हारा पचास

मेरा शहर बढ़ रहा

बहुत ही है प्यासा। बढ़ता ही जा रहा हर तरफ बाहें फैलाता गला घोंटने को है उतावला, यह शहर मेरा। कांक्रीट की यह इमारतें निकल पड़े हैं हर गलि, हर मुहल्ले, हर रास्ते, हरियाली पर कर प्रहार, न जाने किस मुकाम की है तालाश। खामोश बैठा सिसकियां भरता। दो गज़ जमीन का वह टुकड़ा। पेड़ों … Continue reading मेरा शहर बढ़ रहा